हवेली खड़गपुर|पीयूष कुमार प्रियदर्शी
मुजफ्फरगंज क्षेत्र में तैयार की जाने वाली खोवा की लाई ने वर्षों से अपनी एक अलग पहचान बना रखी है। खास बात यह है कि इस पारंपरिक मिठाई की मांग केवल मकरसंक्रांति के पर्व के दिन ही नहीं, बल्कि उससे कई दिन पहले ही बाजार में देखने को मिलने लगती है। ठंड के मौसम में इसकी बिक्री और भी तेज हो जाती है, जिससे स्थानीय बाजारों में रौनक बनी रहती है।
पारंपरिक तौर पर दही-चूड़ा, तिलकुट, तिलवा, भूरा जैसे व्यंजनों के साथ खोवा की लाई को भी विशेष महत्व दिया जाता है। लोग इसे न केवल स्वयं उपयोग में लाते हैं, बल्कि रिश्तेदारों और परिचितों को संदेश के रूप में भेजना भी नहीं भूलते।


ग्रामीण क्षेत्रों में यह परंपरा आज भी जीवित है, जिसके चलते मुजफ्फरगंज की लाई की खपत लगातार बनी रहती है।
मुजफ्फरगंज में दर्जनों परिवार सालों से इस पुश्तैनी व्यवसाय से जुड़े हुए हैं और खोवा की लाई बनाकर अपनी आजीविका चला रहे हैं।
इस कारोबार से प्रेम शंकर साह, टुनटुन साह, बुधनी साह, रंजीत साह, बजरंगी साह, अमर साह सहित कई कारीगर और दुकानदार जुड़े हैं। दुकानदार टुनटुन साह बताते हैं कि छठ पूजा के बाद से ही लाई की मांग बढ़ने लगती है और पर्व नजदीक आते-आते यह अपने चरम पर पहुंच जाती है।
कारीगर प्रेमशंकर के अनुसार, खोवा की लाई बनाने में धान का लावा, गैबी, इलायची, तिल, खोवा, किशमिश, लौंग और चीनी का उपयोग किया जाता है, जिससे इसका स्वाद बेहद खास हो जाता है। इस वर्ष अधिक मांग के चलते बाजार में सामान्य लाई 200 रुपये और स्पेशल लाई 250 रुपये प्रति किलो की दर से बिक रही है।
मुजफ्फरगंज की खोवा की लाई अब सिर्फ स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं है। बिहार के कई जिलों के अलावा बाहर रहने वाले लोग भी इसे मंगवाकर अपने रिश्तेदारों तक पहुंचा रहे हैं, जिससे इस पारंपरिक मिठाई की पहचान लगातार फैलती जा रही है।




