HomeUncategorizedराष्ट्रपति महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में शामिल हुईं

राष्ट्रपति महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में शामिल हुईं


रिपोर्ट: सोनू कुमार पत्रकार

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु आज महाराष्ट्र के वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के छठे दीक्षांत समारोह में शामिल हुईं।

इस अवसर पर राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय भाषाओं के माध्यम से ही भारत की आत्मा की अभिव्यक्ति होती है। उन्होंने कहा कि विभिन्न भारतीय भाषाओं में संस्कृति, संवेदनशीलता और चेतना की एक ही धारा प्रवाहित होती है। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त की कि पूर्वोत्तर क्षेत्र सहित देश भर के विभिन्न राज्यों के विद्यार्थी महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। राष्ट्रपति मुर्मु ने बल देकर कहा कि अंतरभाषाई संवाद की यह परंपरा हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं की उन्नति में योगदान देगी।


राष्ट्रपति ने विद्यार्थियों को सलाह दी कि वे अपनी विरासत पर गर्व करें। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय गौरव की इस भावना के साथ, उन्हें दो राष्ट्रीय उद्देश्यों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। ये उद्देश्य हमारी राष्ट्रीय पहचान-भारतीयता और हमारे साथी नागरिकों, विशेषकर युवाओं की प्रतिभा और आत्मविश्वास से अंतर्निहित तौर पर जुड़े हैं। ये उद्देश्य हैं औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेषों को मिटाना और भारतीय ज्ञान परंपरा को फिर से स्थापित करना। उन्होंने विद्यार्थियों को किसी भी भाषा का विरोध न करने और सभी भारतीय भाषाओं पर गर्व करने की सलाह दी।
श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम पर इस विश्वविद्यालय का नामकरण सर्वथा उचित है। उन्होंने कहा कि इस विश्वविद्यालय से जुड़े सभी व्यक्तियों से यह अपेक्षा है कि वे हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के संवर्धन एवं विकास के प्रति अटूट संकल्प के साथ कार्य करें। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि बापू के आदर्शों का पालन करते हुए महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से जुड़े सभी लोग विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ाएंगे।
राष्ट्रपति ने कहा कि महात्मा गांधी, शिक्षा को स्वावलम्बन का आधार मानते थे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अधिकांश लोगों की जीवन आवश्यकताओं से जुड़ी शिक्षा ही सार्थक शिक्षा है। उन्होंने राष्ट्र हित में काम न आने वाली किसी भी शिक्षा को राष्ट्र अहितकारी शिक्षा बताया और उसकी आलोचना की। उन्होंने कहा कि जनभावनाओं को समझने, लोगों के जीवन में उद्देश्यपूर्ण योगदान और उनके पक्षधारक बनने की क्षमता ही सार्थक शिक्षा है। राष्ट्रपति ने कहा कि शिक्षा के बारे में महात्मा गांधी के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने लगभग सौ वर्ष पूर्व थे।

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि हमारी अपनी भाषा ही सृजन, अन्वेषण और मौलिक चिंतन तथा नवाचार की भाषा हो सकती है। उन्होंने नकल की जगह मौलिक रचनाएं और सृजन का आह्वान किया। उन्‍होंने कहा कि हम एक सशक्त, आत्मनिर्भर और विकसित भारत का निर्माण करना चाहते हैं, जो भारतीय भाषाओं के सुदृढ़ आधार पर ही संभव है। राष्ट्रपति ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति सहित विभिन्न पहल से प्रेरित हमारा देश प्रगति के पथ पर अग्रसर है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के युवा छात्र व्यक्तिगत विकास के साथ ही राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान देंगे और वैश्विक मंच पर भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाएंगे।

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