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500 साल पुराना कुलकुला मंदिर : जहां कभी दी जाती थी नरबलि, आज मुस्लिम समुदाय भी करता है विसर्जन में सहयोग

Report:Piyush Kumar Priyadarshi

खड़गपुर की ऐतिहासिक धरती पर कई धार्मिक धरोहरें हैं, जिनका अपना विशिष्ट महत्व है। इन्हीं धरोहरों में नगर के मध्य एकता पार्क के समीप स्थित कुलकुला मंदिर आज भी आस्था का केंद्र बना हुआ है। यह मंदिर लगभग 500 वर्ष पूर्व किनवार वंश के राजा संग्राम सिंह द्वारा अपनी कुलदेवी की आराधना हेतु स्थापित कराया गया था। तभी से यह स्थान कुलकुला स्थान के नाम से प्रसिद्ध है।

राजा संग्राम सिंह और कुलदेवी की आस्था

किवदंतियों के अनुसार, राजा संग्राम सिंह प्रतिदिन यहां अपनी कुलदेवी की पूजा-अर्चना किया करते थे। कहा जाता है कि देवी प्रसन्न होकर उन्हें ‘खड्ग’ सौंपती थीं। यही वजह है कि मंदिर का नाम भी कालांतर में ‘कुलकुला’ पड़ा।



नरबलि और पशु बलि की प्राचीन परंपरा

इतिहासकारों और लोककथाओं में इस मंदिर की एक रहस्यमयी और डरावनी परंपरा का भी जिक्र मिलता है। लोगों का मानना है कि देवी को प्रसन्न करने के लिए यहां पशुओं की बलि के साथ-साथ नरबलि देने की भी परंपरा रही थी। यह परंपरा मध्यकालीन आस्था और तांत्रिक मान्यताओं से जुड़ी मानी जाती है। धीरे-धीरे यह प्रथा समाप्त हो गई और अब केवल धार्मिक अनुष्ठान व प्रतिमा स्थापना होती है।

आज भी होती है भव्य पूजा

कुलकुला मंदिर में दुर्गा पूजा और काली पूजा के दौरान भव्य आयोजन किया जाता है। आसपास के लोग यहां बड़ी संख्या में दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। इन दिनों में मंदिर प्रांगण में भीड़ उमड़ पड़ती है और श्रद्धालु विशेष अनुष्ठान करते हैं।

सांप्रदायिक सौहार्द की अनोखी मिसाल

इस मंदिर की एक और खासियत है कि यहां हिंदू-मुस्लिम एकता की झलक देखने को मिलती है। दुर्गा पूजा और काली पूजा के दौरान जहां हिंदू श्रद्धालु प्रतिमा स्थापना और पूजा करते हैं, वहीं विसर्जन के समय मुस्लिम समुदाय के लोग भी बढ़-चढ़कर सहयोग करते हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, जो आपसी भाईचारे और सामाजिक सौहार्द का संदेश देती है।

साहित्य में भी दर्ज है महत्व

खड़गपुर नगर पंचायत के पूर्व अध्यक्ष परमानंद केशरी द्वारा लिखित ‘खड़गपुर का सौरभ’ पुस्तक में भी कुलकुला स्थान का विशेष उल्लेख किया गया है। इसमें कवि ने मंदिर के महत्व, आस्था और राजा संग्राम सिंह की देवी आराधना का जिक्र काव्य रूप में किया है।

👉 कुलकुला मंदिर आज केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और सांप्रदायिक सौहार्द का जीवंत प्रतीक है। जहां कभी देवी को प्रसन्न करने के लिए नरबलि दी जाती थी, वहीं आज यह मंदिर समाज को एकता और भाईचारे का संदेश दे रहा है।

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