👉आकांक्षा निधी,दरभंगा(बिहार)
अगर मौका मिला कभी, तो कागज़ पर
अपनी थकान लिखूंगी, मज़बूत कंधों के पीछे
छुपा, वो छोटा सा इंसान लिखूंगी।
वो जो हर मुश्किल में मुस्कुरा कर कहती है,
“सब ठीक है,” उस एक झूठ के पीछे दबे,
हज़ारों बेबस तूफ़ान लिखूंगी।
नहीं लिखूंगी मैं सिर्फ अपनी जीत के चर्चे
दुनिया में, मैं तो हार कर भी जो मुस्कुराई,
वो लहूलुहान स्वाभिमान लिखूंगी।
लिखूंगी वो रातें, जब तकिया गवाह था मेरी
सिसकियों का, पर सुबह उठकर फिर से
पहला, वो चट्टान जैसा इंसान लिखूंगी।
मैं लिख पाऊं कुछ तो, मैं खुद को लिखूंगी,
अपनी रूह के हर जख्म को, अपना ही
सम्मान लिखूंगी।
कविता: “थकान के पीछे का इंसान”
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